एक बार दो आलसी मित्र एक आम के पेड़ के नीचे लेटे हुए थे। इस तरह से लेटे हुए उन्हें बहुत समय बीत चुका था। इस कारण उन्हें भूख भी लगने लगी थी, लेकिन आलसी व्यक्ति भूख के आगे हार मान जाए तो फिर वह आलसी कैसा? वे भी अपनी जगह से नहीं हिले और उन्हें पेड़ के नीचे पड़े हुए सुबह से रात हो गई। जब भूख ज्यादा बढ़ गई तो एक आलसी ने अपना मुँह खोल लिया। उसे ऐसा करते देख दूसरा आलसी अपनी जगह से बिना हिले बोला-ये, क्या कर रहा है तू?

     इस पर पहला आलसी बोला-देख न यार, यह आम का पेड़ कितना निर्दयी है। मैं भूख के मारे कब से मुँह खोले पड़ा हूँ, लेकिन इसे मेरी हालत पर ज़रा भी दया नहीं आती। इसके पास कितने सारे आम हैं, एकाध मेरे मुँह में टपका भी देगा तो इसका क्या घट जाएगा। उसका इतना कहना था कि आम के पेड़ से एक आम टपककर उसकी छाती पर आ गिरा। जैसे आम के पेड़ ने उसकी पुकार सुन ली हो, लेकिन यहां नई मुसीबत। आम टपका भी तो छाती पर। एक बार मुँह में टपकता तो उसे चबाने की तकलीफ वह कर भी सकता था। अब क्या करे? वह सोचने लगा- मेरा आलसी दोस्त तो उठकर खिलाने से रहा, काश! कोई राहगीर यहां से गुज़रे और मुझे आम खिलाए। इस तरह सोचते हुए रात से सुबह हो गई।

     सुबह वहां से जागिंग करता हुआ एक आदमी गुज़रा। उसने देखा कि पेड़ के नीचे पड़े हुए दो व्यक्तियों को एक कुत्ता सूँघ रहा है। उसने सोचा कि शायद दोनों रात में ठंड से ठिठुरकर मर गए हैं, जाकर थाने में खबर करता हूँ। वह ऐसा सोच ही रहा था कि उसकी दृष्टि आलसियों की ऑंखों पर पड़ी। उनकी ऑंखें खुली हुई थीं और पलकें झपक रही थीं। आदमी ने सोचा नज़दीक-जाकर देखता हूँ, माज़रा क्या है? ऐसा विचार कर पहले तो उसने कुत्ते को भगाया और फिर आलसियों के नज़दीक पहुँचकर उसने पूछा-क्यों! जिंदा हो या मर गए? उसकी बात सुनकर पहला आलसी बोला- शुभ-शुभ बोलो भैया! मरें हमारे दुश्मन। हम तो अच्छे-भले हैं और आप जैसे ही किसी भले आदमी का इंतज़ार कर रहे हैं कि वह आकर हमें आम खिलाए जिससे कि कल से भूखे पेट में कुछ तो जाए। उसकी बात सुनकर आदमी को यह समझते देर नही लगी कि उसका पाला आज आसलियों से पड़ा है।

     वह बोला- तुम दोनों आलसी हो क्या? मैं क्यों खिलाऊँ, यह आम तुम्हें खुद खाना चाहिए। इसके पहले कि वह जवाब देता दूसरा आलसी बोला- इसके आलस की तो मत पूछो भैया, रात भर से कुत्ता मेरा मुँह चाट रहा था लेकिन इसकी हिम्मत नहीं हुई कि उठकर उसे भगा दे। तो उसे तुमने खुद क्यों नहीं भगाया? उस आदमी ने पूछा। दूसरा आलसी बोला- मैं कैसे भगाता भैया, मैं तो लेटा हुआ था ना। अच्छा, सही कहा तुमने, तुम तो लेटे हुए थे। ऐसा कहकर उस आदमी ने आलसी की छाती पर पड़े हुए आम को उठाकर घुमाना शुरु कर दिया। उसे ऐसा करते देख दोनों आलसियों ने आम खाने के लिए अपने मुँह खोल लिए, लेकिन आदमी ने आम उन्हें खिलाने की बजाए खुद ही खाना शुरु कर दिया और उन्हें ठेंगा दिखाता हुआ आगे बढ़ गया। उसे मालूम था कि दोनों आलसी उसके इस व्यवहार का भी प्रतिकार करने के लिए नहीं उठेंगे।

     सही सोचा था उसने और आलसियों के साथ किया भी सही। हाथ आए मौके को कोई आलसी ही गवां सकता है। दरअसल वह आम नहीं एक मौका ही तो था और एक बुध्दिमान व सच्चे व्यक्ति मिले हुए अवसर का भरपूर लाभ उठाता है। यही उसने किया भी और स्वादिष्ट आम का भरपूर मज़ा उठाया।

     दूसरी ओर आलसी उसका ठेंगा देखते रह गए। वैसे भी दोनों गलतफहमी में थे कि वे अच्छे-भले हैं। वे तो मनुष्य के सबसे बड़े दुश्मन यानी आलस्य को अपने शरीर में किराएदार बनाकर बैठे हुए हैं। यही वह दुश्मन है जो उन्हें अहसास ही नहीं होने देता कि वे जीवित होकर भी मृत समान ही हैं। इसलिए जब तक वे इससे पीछा नहीं छुड़ाएँगे तब तक ज़िन्दगी में कुछ नहीं कर पाएँगे। एक बात और है, कई लोग आलस्य का मतलब सोने-सुलाने से लेते हैं और सोचते हैं कि हम तो बहुत कम सोते हैं फिर आलसी कैसे हुए। ऐसे लोग भी गलती पर हैं, क्योंकि किसी भी प्रकार की सुस्ती भी आलस्य की श्रेणी में ही आती है। तेज़ी के इस युग में जबकि एक क्षण की सुस्ती भी हमारी किस्मत बिगाड़ सकती हो तो हमें हर वक्त सचेत रहना चाहिए। इसलिए यदि आप किस्मत को मोड़ना चाहते हो, तो आलस्य को छोड़ना होगा। वरना आज के प्रतियोगी युग में यह आम बात है कि किसी की छाती पर गिरे अवसर रूपी आम का मज़ा कोई दूसरा ही लूट रहा होता है। मुझे उम्मीद है आप ऐसा नहीं होने देंगे और अपना आम खुद ही खाएंगे।

 
 
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    July 2009

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